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कोरोना काल में बाप-बेटे को एक गलती की दी थी ऐसी सजा, अब 9 पुलिसवालों को मिली मौत की सजा

तमिलनाडु के सतांकुलम कस्टोडियल डेथ केस में 9 पुलिसकर्मियों को फांसी की सजा. जानिए क्या था पूरा मामला और कोर्ट ने क्या कहा.

कोरोना काल में बाप-बेटे को एक गलती की दी थी ऐसी सजा, अब 9 पुलिसवालों को मिली मौत की सजा
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( Image Source:  @ThilakavathiSam-X )
सागर द्विवेदी
By: सागर द्विवेदी4 Mins Read

Updated on: 6 April 2026 7:03 PM IST

तमिलनाडु के एक छोटे से कस्बे सतांकुलम की वह रात आज भी लोगों के दिलों में सिहरन पैदा कर देती है. एक पिता और उसका बेटा. सिर्फ अपनी रोज़ी-रोटी चलाने के लिए दुकान चला रहे थे. उन्हें क्या पता था कि लॉकडाउन के दौरान दुकान देर तक खुली रखना उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी गलती साबित होगी.

करीब छह साल बाद, उसी दर्दनाक कहानी को न्याय मिला है. मदुरै की अदालत ने इस मामले में नौ पुलिसकर्मियों को मौत की सजा सुनाई है. यह सिर्फ एक फैसला नहीं, बल्कि उस दर्द, उस चीख और उस अन्याय का जवाब है, जिसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था.

क्या थी वो रात, जिसने सब कुछ बदल दिया?

19 जून 2020… कोरोना महामारी के बीच सख्त लॉकडाउन लागू था. पी जयाराज और उनके बेटे जे बेनिक्स अपनी छोटी सी मोबाइल दुकान चलाते थे. उस दिन पुलिस ने उन्हें दुकान देर तक खुली रखने के आरोप में गिरफ्तार किया. बाद में यह आरोप गलत साबित हुआ, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी. उन्हें सतांकुलम पुलिस स्टेशन ले जाया गया… और यहीं से शुरू हुई एक ऐसी कहानी, जिसने इंसानियत को शर्मसार कर दिया.

क्या हिरासत में हुई बर्बरता की हद पार?

परिजनों का आरोप है कि उस रात पिता और बेटे को पूरी रात बेरहमी से पीटा गया. उनके शरीर पर गहरे जख्म थे… ऐसी चोटें, जिन्हें देखकर किसी का भी दिल दहल जाए. रेक्टल ब्लीडिंग जैसे गंभीर संकेत इस बात की ओर इशारा कर रहे थे कि उनके साथ कितनी क्रूरता हुई होगी. यह सिर्फ मारपीट नहीं थी… यह एक ऐसी यातना थी, जिसने दो जिंदगियों को खत्म कर दिया.

कुछ ही दिनों में बुझ गई दो जिंदगियां

पुलिस हिरासत के बाद दोनों को न्यायिक हिरासत में भेजा गया, लेकिन कुछ ही दिनों के भीतर दोनों की मौत हो गई. जब यह खबर बाहर आई, तो पूरे देश में गुस्सा फूट पड़ा. सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक, हर जगह एक ही सवाल था. क्या कानून के रखवाले ही कानून तोड़ रहे हैं?

CBI जांच: सच की परतें खुलती गईं

मामले की गंभीरता को देखते हुए मद्रास हाई कोर्ट ने जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो को सौंप दी. CBI ने इस केस में 10 पुलिसकर्मियों को गिरफ्तार किया, जिनमें एक इंस्पेक्टर, दो सब-इंस्पेक्टर और कई कॉन्स्टेबल शामिल थे. जांच में हत्या का मामला दर्ज किया गया… और धीरे-धीरे सच सामने आने लगा.

महिला कांस्टेबल की गवाही: सच का सबसे बड़ा सबूत

जांच के दौरान एक महिला कांस्टेबल की गवाही ने पूरे केस की दिशा बदल दी. उसने बताया कि पिता-पुत्र को रातभर पीटा गया था… और थाने के अंदर टेबल और लाठियों पर खून के निशान तक थे. यह गवाही सिर्फ बयान नहीं थी… यह उस दर्द की गूंज थी, जिसे छिपाने की कोशिश की गई थी. CCTV फुटेज… जो कभी सामने नहीं आए. जांच के दौरान सबसे बड़ा सवाल उठा.

आखिर CCTV फुटेज कहां गए?

बताया गया कि फुटेज ऑटोमैटिक डिलीट हो जाते थे और उन्हें सुरक्षित नहीं रखा गया. यह एक ऐसा पहलू था, जिसने जांच को और भी मुश्किल बना दिया… लेकिन सच फिर भी सामने आकर रहा. अब मिला न्याय: 9 पुलिसकर्मियों को मौत की सजा. करीब छह साल की लंबी लड़ाई के बाद, मदुरै की अदालत ने दोषी पाए गए 9 पुलिसकर्मियों को मौत की सजा सुनाई. यह फैसला सिर्फ एक सजा नहीं है… यह एक संदेश है कि कानून से ऊपर कोई नहीं, चाहे वह वर्दी में ही क्यों न हो.

एक सवाल, जो अब भी बाकी है…

क्या इस फैसले के बाद पुलिस हिरासत में होने वाले अत्याचार रुक जाएंगे? शायद यह कहना अभी जल्दबाजी होगी… लेकिन इतना जरूर है कि यह मामला भारत के न्यायिक इतिहास में एक मिसाल बन चुका है. यह कहानी सिर्फ एक पिता और बेटे की नहीं… यह उस भरोसे की कहानी है, जिसे टूटने नहीं देना चाहिए.

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