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Assembly Elections 2026 : बंगाल में 34 साल राज करने वाले Left का हो गया अंत या अब सिर्फ ‘वोट कटवा’?

पश्चिम बंगाल में वामपंथ की राजनीति अब कुछ चुनिंदा नेताओं के भरोसे टिकी है. Mohammad Salim, Minakshi Mukherjee और Suryakanta Mishra जैसे चेहरे संगठन को संभाल रहे हैं. जानिए कौन हैं बंगाल के प्रमुख वामपंथी नेता और 2026 चुनाव में उनकी क्या भूमिका हो सकती है.

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( Image Source:  CPIM leaders photo facebook )

​पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव प्रचार अब चरम पर पहुंच गया है. इस बीच चर्चा है कि पश्चिम बंगाल में वामपंथी पार्टियों का 34 साल लंबा शासन (1977–2011) तक, भारतीय राजनीति के लिहाज से अनोखा दौर रहा. कम्युनिस्ट पार्टियों के शासन की अगुवाई CPI-Marxist ने की. ज्योति बसु और बुद्धादेव भट्टाचार्य जैसे नेताओं ने इसे मजबूत आधार दिया था. लेकिन 2011 में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने सत्ता पलट दी. वहीं से Left का पतन शुरू हो गया. 15 साल बाद बंगाल में स्थिति यह है कि वामपंथ खत्म तो नहीं हुआ, लेकिन उसका जनाधार तेजी से सिमट गया है. साल 2016 के बाद से उसका वोट शेयर गिरता गया और 2021 में तो CPM एक भी सीट नहीं जीत सकी.

बंगाल के चुनावी मैदान में लेफ्ट कहां?

अभी भी वाम दल बंगाल की राजनीति से पूरी तरह गायब नहीं हुए हैं, बल्कि नई रणनीति के साथ मैदान में बने हुए हैं. सीपीआई रिवॉल्यूशनरी जैसे दल मिलकर लेफ्ट फ्रंट को जिंदा रखे हुए हैं और अब अक्सर कांग्रेस के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ते हैं. लगातार तीन बार विधानसभा चुनाव हार चुके और एक भी सीट नहीं जीतने वाले वामपंथी पार्टियों का आज भी वहां की हर सीट पर उनकी मौजूदगी है. हालांकि, जीत की संभावना सीमित है. केरल में उनका दबदबा अभी भी कायम है, लेकिन बंगाल और त्रिपुरा में स्थिति पहले जैसी नहीं रही. अब उनका फोकस युवाओं, छात्रों और मजदूर-किसान के मुद्दों पर है. ताकि धीरे-धीरे जमीन वापस बनाई जा सके.

क्या Left अब सिर्फ 'वोट कटवा' बन गया है?

अब बंगाल की मौजूदा राजनीति में मुख्य मुकाबला तृणमूल कांग्रेस और बीजेपी के बीच है. ऐसे में Left की भूमिका काफी हद तक “वोट कटवा' की बन गई है. नॉर्थ बंगाल जैसे इलाकों में उसका वोट 5 से 10% तक सिमट चुका है, जो सीधे तौर पर किसी एक पार्टी के जीत-हार का समीकरण बिगाड़ सकता है. हालांकि, मालदा–मुर्शिदाबाद जैसे क्षेत्रों में, जहां कांग्रेस के साथ उसका गठबंधन है, वहां वह 'किंगमेकर' की भूमिका भी निभा सकता है. यानी बंगाल में कम्युनिस्ट पार्टियां अब जीतने वाला खिलाड़ी नहीं, लेकिन खेल बिगाड़ने वाला फैक्टर जरूर है.

किन इलाकों में अभी भी बचा है असर?

दरअसल, बंगाल के अलग-अलग क्षेत्रों में Left की स्थिति अलग-अलग है. कोलकाता और शहरी इलाकों में उसका सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है, जहां तृणमूल कांग्रेस का अब दबदबा है. युवा वोट BJP तथा TMC में बंट गया है. जंगमहल क्षेत्र (पुरुलिया, बांकुरा, पश्चिम मेदिनीपुर) में अब BJP और TMC का असर ज्यादा है, जिससे Left तीसरे नंबर पर चला गया है. इंडस्ट्रियल बेल्ट (आसनसोल, दुर्गापुर और हावड़ा) में मजदूर राजनीति के बावजूद उसका प्रभाव कमजोर हुआ है. हालांकि, कुछ सीटों पर सरप्राइज की संभावना अभी बनी हुई है.

2026 के चुनाव में Left कितना असर डाल सकता है?

बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 की बात करें तो एक अनुमान के मुताबिक Left का वोट शेयर 5% से 12% के बीच रह सकता है. जबकि सीटें 0 से 5 के बीच सिमट सकती हैं. मुकाबला मुख्य रूप से ममता बनर्जी की टीएमसी और भारतीय जनता पार्टी के बीच ही रहेगा. ऐसे में वामपंथियों की भूमिका spoiler या vote cutter की ज्यादा दिखती है. हालांकि, कुछ क्षेत्रों में गठबंधन के जरिए उसका असर बना रह सकता है.

क्या सत्ता में कम्युनिस्टों की वापसी संभव है?

अब बंगाल में वामपंथ के लिए सत्ता में वापसी करना आसान नहीं है, लेकिन पूरी तरह नामुमकिन भी नहीं. इसके लिए उसे नया करिश्माई नेतृत्व चाहिए. जैसा कभी ज्योति बसु के के दौर में था. साथ ही कैडर को फिर से मजबूत करना होगा और युवाओं के साथ सीधा जुड़ाव बनाना होगा. जब तक ये तीनों चीजें नहीं होतीं, तब तक Left की भूमिका सीमित ही रहने वाली है.

पश्चिम बंगाल विधानसभा की 294 सीटों पर दो चरणों में मतदान होगा. पहले चरण के लिए मतदान 23 अप्रैल को और दूसरे चरण के लिए मतदान 29 अप्रैल को होगा. चार मई को मतगणना के बाद चुनाव परिणाम घोषित किए जाएंगे.

बंगाल में लेफ्ट के भरोसेमंद चेहरे कौन?

पश्चिम बंगाल में वामपंथ की मौजूदा राजनीति कुछ गिने-चुने चेहरों के भरोसे टिकी हुई है. 34 साल के मजबूत कैडर और नेतृत्व की विरासत के बावजूद आज Left के पास करिश्माई और जनाधार वाले नेता सीमित हैं, लेकिन फिर भी कुछ नाम ऐसे हैं जिन पर पूरी रणनीति टिकी है. Mohammad Salim सबसे बड़ा नाम है. सलीम सीपीआईएम पश्चिम बंगाल सचिव हैं. संगठन को फिर से खड़ा करने की जिम्मेदारी इन्हीं के कंधों पर है.

दूसरा बड़ा चेहरा हैं सूर्यकांत मिश्रा हैं, जो लंबे समय से पार्टी के रणनीतिकार रहे हैं. भले ही अब सक्रिय राजनीति में उनकी भूमिका पहले जैसी नहीं है, लेकिन संगठनात्मक फैसलों और दिशा तय करने में उनका प्रभाव बना हुआ है. युवाओं में सबसे चर्चित नाम मीनाक्षी मुखर्जी का है. उन्होंने हाल के वर्षों में सड़कों पर आंदोलन, छात्र-युवा राजनीति और आक्रामक कैंपेन के जरिए अपनी पहचान बनाई है. इसी कड़ी में दिप्सिता धर का नाम सबसे आगे है. बिमान बोस जैसे वरिष्ठ नेता अब भी पार्टी के “मार्गदर्शक” की भूमिका में हैं.

विधानसभा चुनाव 2026
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