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क्या है Dopamine Detox? एक्ट्रेस सुस्मिता मुखर्जी ने बताया कैसे ओवर स्क्रीन टाइम से खुद को रखें दूर

सुष्मिता मुखर्जी ने अपने Dopamine Detox अनुभव को शेयर करते हुए बताया कि कैसे ज्यादा स्क्रीन टाइम से उनकी मेंटल हेल्थ प्रभावित हो रही थी. उन्होंने डिजिटल डिटॉक्स अपनाकर खुद को शांत और बेहतर महसूस किया.

Sushmita Mukherjee Share About Digital Detox
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( Image Source:  Instagram: susmita_mukherjeeofficial )
रूपाली राय
By: रूपाली राय4 Mins Read

Published on: 6 April 2026 10:59 AM

पॉपुलर बॉलीवुड एक्ट्रेस और ऑथर सुष्मिता मुखर्जी (Sushmita Mukherjee) पिछले 40 साल से हिंदी सिनेमा और टीवी जगत में अपनी दमदार एक्टिंग के लिए जानी जाती हैं. उन्होंने 'रुदाली', 'आदमी खिलौना है', 'जान पहचान', 'क्योंकि सास भी कभी बहू थी' और 'अगले जन्म मोहे बिटिया ही कीजो' जैसी यादगार फिल्मों और सीरियलों में काम किया है.

अब सुष्मिता अपनी पर्सनल लाइफ और मेंटल हेल्थ से जुड़ी बातें भी खुलकर शेयर करती हैं. हाल ही में उन्होंने एक बहुत जरुरी और उपयोगी विषय पर बात की है 'डोपामाइन रिहैब' और 'डिजिटल डिटॉक्स'. अब मन में यह सवाल आना लाजमी है कि आखिर डिजिटल डिटॉक्स और डोपामाइन रिहैब है क्या?. इसके बारें में सुष्मिता मुखर्जी ने खुलकर बताया है कि आखिर कैसे लगभग अधिकांश लोग स्क्रीन में टाइम में फंसे रहते है. जो न हमारे दिमाग को बल्कि शरीर को भी थका रही है.

सुष्मिता ने क्या बताया?

सुष्मिता ने बताया कि वे खुद को 'इंफॉर्मेशन एडिक्ट' मानती हैं. उनका स्क्रीन टाइम पहले रोजाना 4 से 5 घंटे तक रहता था. वे लगातार पॉडकास्ट सुनतीं, यूट्यूब वीडियो देखतीं, रील्स देखतीं और नई-नई जानकारी हासिल करती रहती थीं. उनके पसंदीदा पॉडकास्ट स्पीकर्स में राज शमानी और बीयरबाईसेप्स शामिल हैं. साथ ही वे डॉ. जो डिस्पेंजा, ग्रेग ब्रेडन और ब्रूस लिप्टन जैसे फेमस स्पिरिचुअल और मोटिवेशनल गुरुओं को भी बहुत सुनती थीं. लेकिन इतना सब कुछ सुनने और देखने के बाद भी उन्हें बार-बार थकान महसूस होती थी. वे खुद से सवाल करती थीं- 'मैं तो सिर्फ अच्छी-अच्छी बातें सुन रही हूं, फिर इतनी थकान क्यों होती है?. इसी दौरान उन्हें एक छोटी, लेकिन बहुत असरदार किताब मिली 'Dopamine Detox'. यह सिर्फ 60 पेज की किताब है, लेकिन इसने सुष्मिता की पूरी सोच और लाइफस्टाइल बदल दी.

डोपामाइन डिटॉक्स क्या है?

सुष्मिता ने समझाया कि डोपामाइन हमारे दिमाग का वो केमिकल है जो हमें 'और चाहिए, और चाहिए' की फीलिंग देता है. सोशल मीडिया, यूट्यूब, रील्स और पॉडकास्ट के एल्गोरिदम इसी डोपामाइन का फायदा उठाकर हमें अपने जाल में फंसाए रखते हैं. उन्होंने 24 घंटे के डिटॉक्स से शुरू करके अब 8वें दिन तक पहुंच गई हैं. पहले दिन उन्हें बहुत मुश्किल हुई. उन्हें यूट्यूब और रील्स की आदत छूटने का विदड्रॉल (नशा उतरने जैसा) महसूस हुआ. लेकिन अब वे खुद को बहुत हल्का, शांत और बेहतर महसूस कर रही हैं. वे कहती हैं, 'अभी मैं पूरी तरह डिटॉक्स में हूं. मैंने अपने कैमरे के पीछे खड़े रोहन को भी बता दिया है कि मैं अभी कुछ भी नहीं छू रही हूं यह डिजिटल डिटॉक्स भी कहलाता है.'

क्यों जरूरी है यह डिटॉक्स?

आजकल ज्यादातर लोगों का स्क्रीन टाइम 4-5 घंटे या उससे भी ज्यादा हो गया है. इससे दिमाग लगातार उत्तेजित रहता है, एकाग्रता कम होती है, नींद खराब होती है और असली खुशी कम महसूस होती है. सुष्मिता मुखर्जी का यह अनुभव उन सभी लोगों के लिए एक अच्छा मैसेज है जो लगातार स्क्रीन पर रहते हैं. उन्होंने दिखाया कि थोड़े समय के लिए भी सोशल मीडिया, रील्स और अनावश्यक जानकारी से ब्रेक लेकर हम अपनी मेंटल हेल्थ को बेहतर बना सकते हैं.

सुष्मिता का मैसेज

शांति और असली खुशी बाहर की उत्तेजना से नहीं, बल्कि अंदर की शांति से आती है. आप भी अगर महसूस करते हैं कि आपका स्क्रीन टाइम ज्यादा हो गया है और थकान बढ़ गई है, तो सुष्मिता की तरह 'Dopamine Detox' ट्राई कर सकते हैं. छोटी-छोटी शुरुआत से बहुत फर्क पड़ता है.

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